तुम जिंदा भी मरे हुए के समान हो
सन 2010 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां आजकल दिल्ली में बहुत ज़ोरों-शोरों से चल रही है| दिल्ली को नया रंग-रूप देने की कोशिश की जा रही है| सड़कों की मरम्मत का काम तेज़ी से बढ़ा है| नए फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं| और दिल्ली मेट्रो के क्या कहने| हमारे देश में पहली बार कोई काम समय से पहले ही पूरा हुआ है तो वो है दिल्ली मेट्रो का| दिल्ली के कोने कोने तक अब आसानी से और पूरी सहूलियत के साथ सफ़र किया जा सकता है| ब्लू लाइन बसों से भी काफी लोगों को अब छुटकारा मिल गया है| अब तो दिल्ली मेट्रो दिल्लीवालों की ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुकी है| यहाँ बहुत तेज़ ज़िन्दगी है, दौड़ती भागती, किसी के पास इतना समय नहीं है| काम काम और बस काम, इसी में आधी से ज्यादा ज़िन्दगी कट जाती है| कुछ लोग ज़िन्दगी जीते हैं तो कुछ लोगों को ज़िन्दगी जी जाती है|
काम की तलाश में, लगभग पूरे देश से लोग दिल्ली में आते हैं, चाहे वो पढ़े लिखे हों या फिर अनपढ़| ज़्यादातर लोग तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और बिहार से आते हैं| ये वो लोग
हैं जिनमें अनपढ़ लोगों कि संख्या ज्यादा है| उनके पास कोई जगह ज़मीन नहीं है| पहले वो भूमिहारों के यहाँ काम करते थे, गालियाँ खाते थे, लातें खाते थे, भर पेट खाना तो कभी नसीब ही नहीं हुआ| फिर सोचा चलो अब शहरों में काम करेंगे और इस सोच के साथ दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में पहुँच जाते हैं| पर अफ़सोस रोटी तो उन्हें यहाँ भी नहीं मिलती और ना ही कोई ठिकाना|
शायद आप इन्हें अभी तक पहचान न पाएं हों तो चलिए में आपकी मदद कर देता हूँ| सुबह-सुबह आपके घर में एक औरत या फिर एक छोटी सी लड़की आती है, वो सारे घर की सफाई करती है, बर्तन साफ़ करती है, कपड़े धोती है| एक छोटा सा लड़का कचरा उठाने के लिए आता है| आपके बाथरूम का पानी बाहर गट्टर में नहीं जा पा रहा शायद कहीं कुछ अटक गया है तो एक गट्टर साफ़ करने वाला आता है| एक लड़का शायद पास वाली दूकान से राशन और दूध बगेरह भी लेकर आता होगा| चलिए अ
ब ज़रा दरवाजे से बाहर निकलते हैं| क्या आपके घर में या फिर आसपास के घर में कोई चोकीदार है जो गेट पर पहरा देता है, अगर है तो ज़रा ध्यान से देखिये वो कौन है? बाहर सड़क पर निकलेंगे तो देखेंगे कि पानी के पाईप बिछाने का काम भी चल रहा है, शायद आप दो चार गालियाँ भी दें की जब देखो खोदते रहते हैं| पर वहां खुदाई कौन कर रहा है? अगर आपके पास एक गाड़ी है तो वो चमकी हुई नज़र आ रही होगी, हाँ सुबह-सुबह एक लड़का उसे साफ़ करता है| महीने के २० रुपये लेता होगा शायद| सिग्नल पर कुछ बच्चे आपको फूल बेचते हुए, किताबें बेचते हुए, या कुछ और सामान बेचते हुए या फिर भीख माँगते हुए भी नज़र आ जायेंगे, जिन्हें शायद आप गाली देकर वहां से भगा देते हैं, और करना भी चाहिए क्योंकि भीख देना हमारे देश में कानूनी जुर्म है|
कुछ इसी तरह से ये अपना गुज़ारा करते हैं| माँ-बाप, भाई-बहन, सभी लोग मिलकर सारा दिन काम करते हैं तभी जाकर कहीं उनके रहने का गुज़ारा होता है| अब वे एक छोटी सी झोंपडी में कहीं रहते हैं, जिस पर शायद से कोई छत भी न हों? और ये झोंपडी भी ना जाने और कितने दिन की मेहमा
न होगी क्योंकि कभी भी दिल्ली नगर निगम वाले आकर इसे गिरा सकते हैं| और हाँ अभी यहाँ इस झोंपडी में रहने के लिए टैक्स भी तो देना पड़ता है| शायद बड़ी बड़ी इमारतों में रहने वाले भी कभी इतना टैक्स नहीं भरते होंगे| फर्क बस इतना है कि वो सरकार को देते हैं और ये पुलिस वालों को| और अगर किसी दिन ना दें तो पुलिस वाले मार-मार के कचूमर बना देंगे , और झोंपडी तोडेंगे वो अलग|
कुछ लोग कितने भाग्यशाली हैं जिन्हें कम से कम कुछ काम तो मिल जाता है, बाकि कुछ बस सारा दिन काम की ही तलाश में घुमते रहते हैं| और जब कुछ भी नहीं मिलता तो ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर बन जाता है| चोरी, लूटपाट, छीना-झपटी, मारपीट, बगेरह-बगेरह काम ही रह जाते हैं, जिनमें की किसी और को पूछना नहीं पड़ता, या फिर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ते| बस क्या है अब तो समझो अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, जो दिल में आएगा वही करेंगे| और जिन्हें काम मिल जाता है अब उन्हें भी यही डर सताता है की कहीं वो भी न छिन जाये| अब क्योंकि ज़रूरी नहीं है कि जब ये काम करने लगते हैं तो इनकी उम्र 14 साल से ज्यादा ही होगी| और जिनकी होगी भी उन्हें खाने में पूरी खुराक ना मिलने के कारण वो छोटे ही दिखते हैं| तो श्रम
विभाग वाले अब उन्हें यहाँ से इस काम से कभी भी हटा सकते हैं क्योंकि ये बाल मज़दूरों की गिनती में आते हैं| और इन्हें यहाँ से हटा कर इनके माँ-बाप के हवाले कर दिया जाता है तथा साथ में ये हिदायत दी जाती है कि आप आपने बच्चों को काम पर मत भेजिए, उन्हें पढाइए और अच्छी शिक्षा दीजिये| पर जिन्हें खाने को रोटी नसीब नहीं होती वो पढ़ेंगे क्या?अजय सकलानी
Filed under: Politics, Society | 5 Comments
Tags: child labour, poverty









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