ऑस्ट्रेलिया में भारतियों के साथ आज जो भेदभाव हो रहा है उसे हम नस्लवाद का नाम देकर एक बहुत बड़ा मुद्दा बना रहे हैं| अमिताभ बच्चन ने ऑस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाले सम्मान को यह कहा कर ठुकरा दिया कि मैं उस देश से किसी भी तरह का कोई सम्मान ग्रहण नहीं करूँगा जो हमारे देश के लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर सकता| वहीँ आमिर खान ने भी इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणी दी| किन्तु नसलवाद क्या केवल वही है जो किसी दूसरे देश के लोग हमारे देश के लोगों के साथ कर रहे हैं| क्यों हम झल्ला जाते हैं जब कभी भी ऐसी कोई घटना घटती है|

दो साल पहले भारतीय अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के साथ भी एक ऐसी ही घटना एक रियलिटी शो “बिग ब्रदर” के दौरान घटी थी| उस वक़्त भारतीय संसद तक उसकी गूंज सुनाई दी थी| जबकि उसी घटना के दौरान गुजरात में बाढ़ से हजारों लोगों की जान खतरे में पड़ी थी और उसका संसद में बैठे हमारे नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ा| बहस का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय मामले में कुछ ऐसे उठता है कि उसके सामने बड़े से बड़ी घटना दफ़न हो कर रहा जाती है| भला कौन जाने कि क्या शिल्पा शेट्टी के साथ घटी घटना सच भी थी या फिर अपने कार्यक्रम को मुफ्त में पबलिसिटी दिलाने की एक चाल|

सवाल यह है कि कोई भी नस्लवाद का मुद्दा अंतरार्ष्ट्रीय होने पर ही क्यों नस्लवाद का मुद्दा कहलाता है| मुंबई में हो रहे उत्तर भारतियों के साथ भेदभाव को हम क्या कहेंगे? असम की घटनाओ को हम क्या कहेंगे? पंजाब में बिहारियों के साथ होने वाले भेदभाव को हम क्या कहेंगे? ऐसे सवाल बहुत सारे हैं जिन्हें हम दफ़न करना ज्यादा बेहतर समझते हैं| पर क्यों दफनाया जाता है इन सवालों को? क्योँकि ये सीधे सीधे हमारे देश कि उस जनता से जुड़े हैं जो वोट बैंक के रूप में काम आती है?

ज़रूरी यह है कि हम असलियत पर पर्दा गिराने की वजाय उसे हटाने का काम करें| दुसरे देश किसी एक भारतीय के साथ घटी घटना को हम अपने पूरे देश पर हमला मान लेते हैं तो हमारे देश में जो इतनी बड़ी बड़ी घटनाएं घटा रही हैं उन्हें भी उसी रूप में देखना चाहिए| बस यही कहना चाहूँगा कि :


उठो
कहीं सुबह का इंतजार लम्बा न हो जाए
चलो
कहीं पथ फिर अपना न खो जाए
बोलो
कहीं दब ना जाए आवाजें सारी
लड़ो
कहीं खोखली न हो जाए ताकत हमारी


अजय सकलानी



5 Responses to “कैसा नस्लवाद कैसा रूप”  

  1. 1 गिरिजेश राव

    मेरे पोस्ट http://girijeshrao.blogspot.com/2009/06/1.html पर कमेंट के लिए धन्यवाद। यह विषय कई पहलुओं वाला है।

    आप से अनुरोध है कि मेरे इस पोस्ट का दूसरा भाग http://girijeshrao.blogspot.com/2009/06/2.html और उस पर टिप्पणियों को अवश्य पढ़ें। सम्भवत: आप पूर्णता का अनुभव करेंगें।

  2. 2 Ajay Saklani

    धन्यावाद गिरिजेश जी, आपके लेखा पढ़कर अत्यंत ख़ुशी हुई| आशा करता हूँ कि भविष्य में भी आपकी कीमती टिप्पणियां मिलती रहेगी|

  3. 3 बालसुब्रमण्यम

    मुंबई, असम, मेलबोर्न – इन तीनों जगहों पर घटी घटनाएं एक समान हैं और एक समान निंदनीय हैं।

    रही बात मेलबोर्न की घटनाएं – वे एक या दो लोगों तक सीमित घटनाएं नहीं हैं। आस्ट्रेलिया में इस तरह की नस्लवादी घटनाओं की एक लंबी परंपरा है। अभी हाल तक आस्ट्रेलिया श्वेतवाद की नीति पर चल रहा था, जिसके तहत केवल गोरी चमड़ी वाले लोगों को ही वहां नागरिकता दी जाती थी। जब विश्व भर में गोरी चमडी वालों की संख्या घटने लगी, तो उन्हें झक मारकर अन्य लोगों को भी आस्ट्रेलिया आने देना पड़ा। यह उनके लिए अस्तित्व का सवाल था। इतने बड़े महाद्वीप को चलाने के लिए वहां पर्याप्त लोग नहीं थे।

    वर्ष 2008 में भारतीय मूल के आस्ट्रेलियाइयों पर 1,441 हमले हुए, यानी हर रोज 3-4 हमले। इतने बड़े पैमाने पर हमला तभी हो सकता है जब पूरे आस्ट्रेलियाई गोरों के मन में भारतीय मूल के लोगों के प्रति द्वेष भावना भरी हो।

    जुर्म को सहना भी जुर्म में भागीदार होने के समान है। यह गांधी जी ने खूब स्पष्ट किया है। इसी तरह के नस्लवादी हमले के विरुद्ध युवा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह चलाया था।

    आस्ट्रेलिया के भारतीयों को भी इन हमलों को चुपचाप न सहकर जोरदार तरीके से उसका प्रतिकार करना चाहिए। इसमें भारत सरकार और भारतीय लोग भी उनकी मदद कर सकते हैं।

    जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका के नस्लवाद के विरुद्ध लड़ रहे थे, तब उनके समर्थन में गोखले, तिलक आदि ने उनकी खूब सहायता की थी। गोखले तो दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर भी गए।

    इस परिप्रेक्ष्य में अमिताभ का डोक्ट्रेट की पदवी लौटना आस्ट्रेलिया के नस्लवाद का विरोध करने का एक गंभीर एवं सौम्य कदम है।

    हम आस्ट्रेलिया में बनी चीजों का बहिष्कार करके, वहां छुट्टियां मनाने न जाकर, और अपने बच्चों को वहां पढ़ने न भेजकर, इस नस्लवाद का विरोध कर सकते हैं।

  4. 4 awesh

    एकदम सही कहा रहे हैं आप अजय ,विभेद तो हमारे अपने देश में अपने लोगों के साथ भी है ,अंतर सिर्फ ये है अपने लोगों से तो हम लड़ सकते हैं ,उनका क्या करें जो सात समुन्दर पार हमारे अपनोंपर वार कर रहे हैं

  5. 5 Ajay Saklani

    बालसुब्रमण्यम जी, सबसे पहले तो धन्यावाद कि आपने मेरे लेख को पढ़कर अपने विचार रखे| मैं अभी अपने आप को तथ्यों के विश्लेषण मे कमज़ोर मानता हूँ, और अपने अनुभव से जो भी सवाल आप सभी के समक्ष रख पाऊँ, रखने कि कोशिश करता हूँ| अपने शब्दों मे एक स्थिरता लाने के लिए मुझे आप जैसे जानकार लोगों कि टिप्पणियों और सुझाओं का हमेशा इंतज़ार रहेगा|

    यहाँ मेरा सवाल यह था कि जब कोई मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हो तो हम झल्ला पड़ते हैं, फिर जब ऐसी ही घटना अपने देश मे घटती है तो उसके बारे मे कभी संसद मे कोई गूंज क्यों नहीं सुनाई पड़ती? कृपया इस पर थोड़ी रोशनी डालें|

    आवेश जी आपका भी बहुत बहुत धन्यावाद|


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