अभी वह एक विश्वविद्यालय में केवल एक छात्र है, यह भी नहीं पता कि पास भी हो पायेगा या नहीं, और हो भी गया तो एक डिग्री सब कुछ नहीं होती| डिग्री मिल जाने से वह कमाने नहीं लग जायेगा| हजारों लोग डिग्रियां लिए खड़े हैं, लम्बी कतारें लगी हैं मानो राशन की दुकान के बाहर खड़े हों, लेकिन नौकरी किसे मिलेगी यह कोई नहीं जानता| परन्तु उसने भविष्य का एक सहारा तलाश लिया, एक गरीब बाप को लूट लिया, शादी करने वाला है कुछ ही दिन में, बेटी के साथ साथ 10 लाख रूपया भी हेंठ लिया|

यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि हमारे समाज का एक भदा सच है एक काला सच| यहाँ लोग दुआ करते हैं कि उनके घर मे कभी भी बेटी पैदा ना हो| खासकर अगर यह एक गरीब परिवार की बात है तो| पहले तो उसे पाल पोस के बड़ा करो, पढ़ाओ लिखाओ और एक ऐसे संघर्ष के लिए तैयार करो जहाँ आदमी प्रधान इस समाज मे उसे आज़ादी से जीने का भी मौका नहीं मिलता| हाँ हम जानते हैं कि उसे मौका नहीं अपना हक़ चाहिए परन्तु हक़ की बातें तो खोखली होकर ही रह गयी हैं|

सालों से इंतजार करते एक बाप के लिए अब वह दिन आता है जिसका वह बेटी पैदा होने के पल से ही इंतजार कर रहा होता है| इसलिए नहीं की उसे ख़ुशी हो रही है बल्कि इस लिए कि अब उसे अपनी बेटी के लिए एक अच्छा लड़का भी खरीदना है| हमारे इस खोखले समाज की यह सबसे शान वाली बात है कि अब हम अपने बेटों को बेच कर नौकरानी के रूप मे एक बहु घर लेकर आते हैं| अब बोलियाँ लगाने का दौर शुरू हो जाता है और लोग अपने-अपने बेटे लेकर लड़की के घर वालों से मिलते हैं| और फिर अपने बेटे की बोली लगाते हैं, 8 लाख, 10 लाख, 12 लाख, 15 लाख या फिर 20 लाख…………..

यूं तो कानूनन दहेज़ लेना और देना दोनों ही अपराध हैं पर वह कानून है कहाँ? क्या किसी नें उसे कभी देखा है? या फिर वह भी दब कर रहा गया है समाज की खोखली दलीलों के सामने| दहेज़ प्रथा बंद होने के बजाये अपने पैर और भी पसार रही है| ना जाने कब तक यूं ही निर्दोष लड़कियाँ और उनके मां बाप इसी तरह दहेज़ की बलिचढ़ते रहेंगे????


आज एक नई कसक दिल में पैदा हुई है
ख़ुशी मेरे लबों पर नज़र आई है
हाँ जानता हूँ मुझे प्यार है उस से
वो ना भी मिले तो क्या रुसवाई है?

दो पल ख़ुशी के बिताता हूँ उस संग
ख्वाबों में मेरे अब वो ही समायी है
नम आँखें भी मेरी अब यही कहती हैं
वो ना भी मिले तो क्या रुसवाई है?


Song of Youth

31Jul09

Song of Youth

Me and My Nation – India

As a young citizen of India,
armed with technology, knowledge and love for my nation,
I realize, small aim is a crime.

I will work and sweat for a great vision,
the vision of transforming India into a developing nation
powered by economic strength with value system.

I am one of the citizens of a billion,
only the vision will ignite the billion souls,
it has entered into me,
the ignited soul compared to any resource,
is the most powerful resource
on the earth, above the earth and under the earth.

I will keep the lamp of knowledge burning
to achieve the vision – Developed India

Dr. APJ Abdul Kalam


ये हमारी दुनिया है….


ये क्या नशा है, मोहब्बत का लगता है शायद

दिलों में जूनून है, धड़कन का लगता है शायद||


उमंगें खिल रही हैं, बाग़ में जैसे फूल कोई

अरमान जग रहे हैं, है रात जैसे सोयी सोयी

तनहाई इस दिल की खोई सी लगती है शायद

ये क्या नशा है मोहब्बत का लगता है शायद ||


दुल्हन सा लगता है चाँद भी अब शरमाये

ओढे चुनरी घूँघट सी, बादलों में छुप जाये

चांदनी को यह डर है, खो रही है वो शायद

ये क्या नशा है मोहब्बत का लगता है शायद

दिलों में जूनून है, धड़कन का लगता है शायद ||


यह बात अक्सर सुनने में आती है कि हमारे देश में अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब| लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि अब हमारे भगवान् लोगों से भी ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं| हाल ही में इंडिया टुडे पत्रिका के हिंदी अंक में प्रकाशित लेख “आस्था की चमक” के सामने मेरी आंखें तो चौंधिया गयी| अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और वेल्लूर के श्रीपुरम मंदिर में जड़े करोड़ों रूपए के सोने के बाद अब तिरुपति बालाजी भगवान् मंदिर को भी स्वरण युग में शामिल किया जा रहा है|

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के कार्यकारी अधिकारी, के. वी. रमणाचारी के अनुसार, तिरुपति बालाजी भगवन मंदिर को स्वर्णिम रूप देने में लगभग 12.71 करोड़ रूपए के सोने का इस्तेमाल होगा| 2009-10 में मन्दिर के कार्यों के लिए TTD का बजट 1363 करोड़ रुपये है| जबकि प्रतिवर्ष लगभग 520 करोड़ रुपये का चढावा तिरुपति बालाजी भगवन मन्दिर में चढ़ता है|

क्या करेंगे हमारे भगवन इतने रुपये कमा कर, जहाँ हमारे देश की आधी से ज्यादा जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है और उन्हें भरपेट खाना भी नहीं मिलता हो| क्या उन्हें भूखा रखकर हमारे भगवान् खुश रहेंगे| ज़रा नीचे दी इन आंकडों पर एक नज़र डालिए :-

  • 12.71 करोड़ रुपये का सोना = लगभग 31.77 लाख लोगों के लिए एक दिन का भरपेट खाना
  • 520 करोड़ का सालाना चढावा = लगभग 4 करोड़ लोगों को एक महीने तक भरपेट खाना
  • 2009-10 के लिए 1363 करोड़ रुपये का बजट = लगभग 11 करोड़ लोगों के लिए एक महीने तक भरपेट खाना

अब ज़रा एक नज़र डालते हैं योजना आयोग द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण पर….

योजना आयोग के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 28.3 प्रतिशत लोग और शहरी क्षेत्रों में 27.5 प्रतिशत लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं| अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि पूरे परिवार की एक दिन की आय $1 ( 45-50 रुपयेप्रतिदिन) से कम है तो उसे गरीबी रेखा से नीचे मन जाता है, और यदि किसी परिवार की एक दिन की आय $2 (90-100 रुपये प्रतिदिन) है तो वह परिवार गरीब कहलाता है जबकि भारत में 80 प्रतिशत परिवार इस श्रेणी में आते हैं| वैसे ऊपर दिए गए आंकड़े सरकारी सर्वेक्षण से लिए गए हैं और सरकारी सर्वेक्षण कैसे होते हैं शायद आप सभी अच्छी तरह से जानते ही होंगे|

माफ़ कीजियेगा आपको में मन्दिर की दुनिया से ज़रा किसी और दुनिया में ले गया था परन्तु उसे जानना भी ज़रूरी था| अब जब हमारे देश में कुछ ऐसी स्थिति है तो क्या मंदिरों का इस तरह से और भी अमीर होना कहाँ तक सही है ?

जरा सोचिये?

अजय सकलानी



हिन्दी समय कार्यक्रम चल रहा था, और मशहूर रंगकर्मी और निर्देशक हबीब तनवीर जी के नाटक “चरणदास चोर” देखने के लिए भीड़ लगी हुई थी| मैं हमेशा की तरह कार्यक्रम का फिल्मांकन कर रहा था| ज्यों ही कार्क्रम ख़त्म हुआ सारी भीड़ बस हबीब जी के साथ फोटो खिंचवाने के लिए उनके आस-पास इकठ्ठा हो हो हो गई| फ़िर क्या था एक दुसरे को धक्का-मुक्की करते हुए अपनी अपनी फोटो खिंचवाने लगे| मुझे भी पहली बार मौका मिला था तो मैंने भी सोचा बहती गंगा में हाथ दो लो| फ़िर क्या था, कुछ धक्के मैंने भी खाए और कुछ खिलाये, और यही नहीं उसका फायदा भी मिला, आखिरकार मैंने भी हबीब जी के साथ एक फोटो तो खिंचवा ही ली| ज़रा देखो तो सही किस तरह से सभी खुश हो रहे हैं, किसी के चेहरे में तो झूठी हंसी साफ देखि जा सकती है| आखिर हम सब फोटो खिंचवाते हुए इतना झूठ-मूठ में क्यों मुस्कुराते रहते हैं| खैर जो भी है पर यह फोटो मेरे लिए भी हमेशा के लिए यादगार रहेगी, आखिर हबीब जी से यह मेरी पहली और आखिरी मुलाक़ात जो थी| यह तो शायद आप सभी जानते ही होंगे कि कुछ दिन पहले उनका देहांत हो गया| पर चरणदास चोर आज भी हमारे बीच में है और हमेशा रहेगा, उनकी आवाज़ बनकर| एक रंगकर्मी को मेरी ओर से श्रद्धांजली ….नमन करता हूँ मैं हबीब जी को|


हमारे देश के विद्वान् लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहते हैं कि हम हिन्दुस्तानी होकर शायद अपनी भाषा हिन्दी को ही भूल गए हैं| हम में दूसरी भाषाओं को आपनाने की होड़ सी लग गयी है| जनवरी माह में, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में हिन्दी समय का आयोजन भी हुआ| उस समय लगभग पूरे देश से काफी नामी गिरामी विद्वान् आए और उन्होंने अपनी अपनी बात सब के समक्ष रखी| विश्वविद्यालय के कुलपती श्री विभूती नारायण राय नें सभी के विचारों का स्वागत भी किया| उस समय मेरी जिम्मेवारी कार्यक्रम को फिल्माने की थी तो मैं थोडा थोडा कर सभी के विचारों को सुन पा रहा था| बात हिन्दी को लेकर चल रही थी तो हिन्दी का अवलोकन अलग अलग प्रदेशों, संस्कृतियों और व्यक्तियों के नज़रिए से किया गया| सब ठीक ठाक रहा, और 5 दिन के कार्यक्रम के बाद सभी अपनी अपनी बात कह कर वापिस अपने घरों को लौट गए| कुछ ऐसी बातें भी कह गए जो शायद वो कभी अपनी ज़िन्दगी में भी नहीं अपनाते होंगे| अभी आजकल तो हिन्दी ब्लॉग जगत में लोगों की एक भीड़ सी लग गयी है| हिन्दी ब्लॉग जगत नें लोगों को अपनी बात रखने के लिए एक नया मंच दिया है| हम सब हिन्दुस्तानी है और हमारे लिए हिन्दी पढ़ना और लिखना दोनों ही ज़रूरी है| शायद यही एक साधन है जो हमारे देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में कारगर होगा| किन्तु मैं यहाँ जो अपने विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ, उसका संशय केवल हिन्दी से ही नहीं बल्कि एक ऐसी भाषा और संस्कृति से है जिसे हम अपना मानते आये हैं और जो अभी धीरे धीरे हमारे बीच से कहीं दूर जाती हुई नज़र आ रही है|

मैं यहाँ सबसे पहले अपना उदहारण देना चाहूँगा| मैं हिमचल प्रदेश के जिला मंडी का रहने वाला हूँ| हिमाचल की प्रादेशिक भाषा हिन्दी और पहाड़ी है| सरकारी कामकाज सभी हिन्दी में ही होता है और जनसंचार की भाषा में हिन्दी और पहाड़ी दोनों का ही इस्तेमाल होता है| मंडी की जहाँ तक बात है वहां के लोग अपनी भाषा को मंडयाली कहते हैं| मंडयाली और पहाड़ी एक ही भाषा है बस थोडा सा बदलाव ज़रूर है| हिमाचल को वैसे भाषा के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है ऊपरी हिमाचल और निचला हिमाचल| ऊपरी हिमाचल कि जो भाषा है उसे समझना मेरे लिए भी आसान नहीं है| इसमें लाहौल स्पीति, किन्नौर, शिमला के कुछ उपरी भाग शामिल हैं| मेरे लिए मंडयाली सबसे पहले आती है क्योंकि मैं उस जगह का रहने वाला हूँ, फिर दूसरा स्थान मैं पहाड़ी को दूंगा क्योंकि वो भी मेरे ही क्षेत्र की भाषा है| फिर इसके बाद का स्थान मैं हिन्दी को दूंगा क्योंकि वो मेरी राष्ट्र भाषा है| अत: कुछ इस तरह मैं अपने जीवन मैं इन भाषाओं को अलग अलग श्रेणियों में बांटता हूँ| अब यह बात केवल मुझ पर ही लागु नहीं होती बल्कि हर एक इंसान पर लागु होती है| कोई बिहार का रहने वाला पहले अपने छोटे से प्रान्त की भाषा को महत्व देगा, फिर भोजपुरी तथा बाद में हिन्दी| और यह ज़रूरी भी है|

पैदा होने के बाद से जब हम पहली बार कोई शब्द बोलते हैं तो वो माँ होता है| फिर उसके बाद हम दूसरों के साथ संपर्क बनाने के लिए उसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो हमारे आस-पास के लोग बोलते हैं| हम उसी भाषा को बोलकर बड़े होते हैं, सोचते समझते हैं| यहाँ तक कि जिन स्कूलों में हम पढ़ते हैं वहां पढ़ाई का माध्यम चाहे कोई भी हो पर जब बात किसी विषय को समझने की होती है तो हम वापिस अपनी ही भाषा में उसे समझते हैं, और हमारे अध्यापक भी हमें हमारी सरल भाषा में ही समझाते हैं| और वही हमारी मात्री भाषा होती है| किन्तु आज जहां हमें उसे बचाने कि ज़रूरत है और समझने की ज़रूरत है, वहीँ पर वो भाषा कहीं न कहीं लुप्त होती नज़र आ रही है| और उसका स्थान एक ऐसी भाषा ले रही है जिसका हमारी भाषा और संस्कृति से कोई रिश्ता ही नहीं है|

गाँव की भाषा में बदलाव

सबसे पहले हम गाँव की ओर एक नज़र डालते हैं| जब हम गाँव में जाते हैं तो वहां हमें आज भी वही भाषा मिलती है जीसे हम कभी छोड़ कर आये थे| बहुत ख़ुशी होती है और ऐसा लगता है जैसे हमारा अपना कुछ खो गया था और अब वापिस मिल गया हो| किन्तु यह भाषा केवल उन्ही लोगों के बीच रह गयी है जो गाँव से कभी बाहर नहीं गए| पर जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से बात करते हैं जो बाहर रहता हो या रह कर आया हो तो हमें वो फर्क साफ़ नज़र आता है| क्योंकि वह बाहर किसी शहर में या फिर दूसरी जगह में रहकर आया होता है तो वो वहां की भाषा के बहुत से शब्दों को अपना लेता है| किन्तु उसका मतलब यह नहीं है कि वह अपनी भाषा को भूल गया है| वह उसे कभी नहीं भूल सकता| पर अब वह दूसरों को यह दिखाना या जाताना चाहता है कि वह उनके जैसा नहीं है बल्कि समझदार हो गया है तथा modern (आधुनिक) बन गया है| जब किसी से बात करता है तो जहाँ पहले अम्मा बोला करता था अब मदर (mother) बोलता है| जहाँ कभी बाबूजी बोलता था वह स्थान अब फादर (father) नें ले लिया है| चाचा-चाची या काका-काकी अब अंकल-आंटी बन गए हैं| अच्छी बात यह है कि वह अब अंग्रेजी भी बोलने लगा है पर ग़लत यह है कि वह यह भाषा उनके साथ बोलने लगा है जहाँ इसकी ज़रूरत नहीं है| यहाँ अब वो अपनी गाँव देहात की भाषा छोड़ कर, अंग्रेजी, हिन्दी और दूसरी भाषाओँ के शब्दों का ज्यादा प्रयोग करने लगा है| और यह आदत एक दिन उस से उसकी अपनी भाषा को छीन लेगी, वह अपनी पहचान से दूर हो जायेगा|

वहीँ पर कुछ ग़लती उन माँ बाप की भी है जो अब गाँव से बाहर रहने लगे हैं| मुझे याद है जब पूरे 16 साल तक अपनी भाषा में बात करने और अपने लोगों के बीच रहने के बाद मैं अपने पापा के साथ (मैं बचपन से ही पापा बोलता हूँ) जम्मू में रहने गया था तो वहां कितना अजीब लगता था हिन्दी में बात करना| और आज लगभग 10 साल तक बाहर के लोगों के साथ हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में बात करने के बाद भी मेरे घर में केवल और केवल मंडयाली में ही बात होती है| किन्तु दुःख की बात यह है कि माँ बाप अपने बच्चों को आज अपनी भाषा छोड़ कर और हिन्दी भी नहीं बल्कि अंग्रेजी में ही बात करने केलिए प्रोत्साहित करने लगे हैं| आज वही माँ बाप भी अपनी भाषा को भूल गए हैं| कुछ दिन पहले मुझे बहुत दुःख हुआ जब मैंने अपनी छोटी सी भतीजी से फ़ोन पर बात की| वो मुझे बड़े प्यार से चाचू-चाचू कहकर बुलाती थी| किन्तु उस दिन जब मेरे भईया ने उसे फ़ोन दिया तो यह कहा कि ये लो अपने अंकल से बात कर लो| और वह भी मुझसे ठीक से बात नहीं करपाई| ना तो वह अंकल ही बोल पायी और न ही चाचू|


आज मित्र नरेश से मेल द्वारा प्राप्त हुए कुछ चित्र आपके समक्ष रख रहा हूँ| इन्हे शब्दों की ज़रूरत नहीं है, बस तस्वीरें ही सब कह जाती हैं| और अगर ज़रूरत है तो बस आपके सहयोग की|













सन 2010 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां आजकल दिल्ली में बहुत ज़ोरों-शोरों से रही है| दिल्ली को नया रंग-रूप देने की कोशिश की जा रही है| सड़कों की मरम्मत का काम तेज़ी से बढ़ा है| नए फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं| और दिल्ली मेट्रो के क्या कहने| हमारे देश में पहली बार कोई काम समय से पहले ही पूरा हुआ है तो वो है दिल्ली मेट्रो का| दिल्ली के कोने कोने तक अब आसानी से और पूरी सहूलियत के साथ सफ़र किया जा सकता है| ब्लू लाइन बसों से भी काफी लोगों को अब छुटकारा मिल गया है| अब तो दिल्ली मेट्रो दिल्लीवालों की ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुकी है| यहाँ बहुत तेज़ ज़िन्दगी है, दौड़ती भागती, किसी के पास इतना समय नहीं है| काम काम और बस काम, इसी में आधी से ज्यादा ज़िन्दगी कट जाती है| कुछ लोग ज़िन्दगी जीते हैं तो कुछ लोगों को ज़िन्दगी जी जाती है|

काम की तलाश में, लगभग पूरे देश से लोग दिल्ली में आते हैं, चाहे वो पढ़े लिखे हों या फिर अनपढ़| ज़्यादातर लोग तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और बिहार से आते हैं| ये वो लोग हैं जिनमें अनपढ़ लोगों कि संख्या ज्यादा है| उनके पास कोई जगह ज़मीन नहीं है| पहले वो भूमिहारों के यहाँ काम करते थे, गालियाँ खाते थे, लातें खाते थे, भर पेट खाना तो कभी नसीब ही नहीं हुआ| फिर सोचा चलो अब शहरों में काम करेंगे और इस सोच के साथ दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में पहुँच जाते हैं| पर अफ़सोस रोटी तो उन्हें यहाँ भी नहीं मिलती और ना ही कोई ठिकाना|

शायद आप इन्हें अभी तक पहचानपाएं हों तो चलिए में आपकी मदद कर देता हूँ| सुबह-सुबह आपके घर में एक औरत या फिर एक छोटी सी लड़की आती है, वो सारे घर की सफाई करती है, बर्तन साफ़ करती है, कपड़े धोती है| एक छोटा सा लड़का कचरा उठाने के लिए आता है| आपके बाथरूम का पानी बाहर गट्टर में नहीं जा पा रहा शायद कहीं कुछ अटक गया है तो एक गट्टर साफ़ करने वाला आता है| एक लड़का शायद पास वाली दूकान से राशन और दूध बगेरह भी लेकर आता होगा| चलिए ज़रा दरवाजे से बाहर निकलते हैं| क्या आपके घर में या फिर आसपास के घर में कोई चोकीदार है जो गे पर पहरा देता है, अगर है तो ज़रा ध्यान से देखिये वो कौन है? बाहर सड़क पर निकलेंगे तो देखेंगे कि पानी के पाईप बिछाने का काम भी चल रहा है, शायद आप दो चार गालियाँ भी दें की जब देखो खोदते रहते हैं| पर वहां खुदाई कौन कर रहा है? अगर आपके पास एक गाड़ी है तो वो चमकी हुई नज़र रही होगी, हाँ सुबह-सुबह एक लड़का उसे साफ़ रता है| महीने के २० रुपये लेता होगा शायद| सिग्नल पर कुछ बच्चे आपको फूल बेचते हुए, किताबें बेचते हुए, या कुछ और सामान बेचते हु या फिर भीख माँगते हुए भी नज़र जायेंगे, जिन्हें शायद आप गाली देक वहां से भगा देते हैं, और करना भी चाहिए क्योंकि भीख देना हमारे देश में कानूनी जुर्म है|

कुछ इसी तरह से ये अपना गुज़ारा करते हैं| माँ-बाप, भाई-बहन, सभी लोग मिलकर सारा दिन काम करते हैं तभी जाकर कहीं उनके रहने का गुज़ारा होता है| अब वे एक छोटी सी झोंपडी में कहीं रहते हैं, जिस पर शायद से कोई छत भी हों? और ये झोंपडी भी ना जाने और कितने दिन की मेहमा होगी क्योंकि कभी भी दिल्ली नगर निगम वाले आकर इसे गिरा सकते हैं| और हाँ अभी यहाँ इस झोंपडी में रहने के लिए टैक्स भी तो देना पड़ता है| शायद बड़ी बड़ी इमारतों में रहने वाले भी कभी इतना टैक्स हीं भरते होंगे| फर्क बस तना है कि वो सरकार को देते हैं और ये पुलिस वालों को| और अगर किसी दिन ना दें तो पुलिस वाले मार-मार के कचूमर बना देंगे , और झोंपडी तोडेंगे वो अलग|

कुछ लोग कितने भाग्यशाली हैं जिन्हें कम से कम कुछ काम तो मिल जाता है, बाकि कुछ बस सारा दिन काम की ही तलाश में घुमते रहते हैं| और जब कुछ भी नहीं मिलता तो ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर बन जाता है| चोरी, लूटपाट, छीना-झपटी, मारपीट, बगेरह-बगेरह काम ही रह जाते हैं, जिनमें की किसी और को पूछना नहीं पड़ता, या फिर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ते| बस क्या है अब तो मझो अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, जो दिल में आएगा वही करेंगे| और जिन्हें काम मिल जाता है अब उन्हें भी यही डर सताता है की कहीं वो भी छिन जाये| अब क्योंकि ज़रूरी नहीं है कि जब ये काम करने लगते हैं तो इनकी उम्र 14 साल से ज्यादा ही होगी| और जिनकी होगी भी उन्हें खाने में पूरी खुराक ना मिलने के कारण वो छोटे ही दिखते हैं| तो श्रम विभाग वाले अब उन्हें यहाँ से इस काम से कभी भी हटा सकते हैं क्योंकि ये बाल मज़दूरों की गिनती में आते हैं| और इन्हें यहाँ से हटा कर इनके माँ-बा के हवाले कर दिया जाता है तथा साथ में ये हिदायत दी जाती है कि आप आपने बच्चों को काम पर मत भेजिए, उन्हें पढाइए और अच्छी शिक्षा दीजिये| पर जिन्हें खाने को रोटी नसीब नहीं होती वो पढ़ेंगे क्या?अजय सकलानी




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